You are welcome to my memorabalia!!! Here you would come across some of my very dearest creations...my poems..my heart & soul...You may agree, disagree or be indifferent to my thought process...however, if you come here once you would certainly not be able to ignore it :) Hope you enjoy reading it as much as I enjoyed writing these years ago...and may be even now :) Cheers!! Live, Love & Laugh!!
Sunday, February 14, 2021
Happy Valentines Day
Thursday, December 31, 2020
Bye Bye 2020, Hello 2021
2020 has been an exceptional and unusual
year...
A year that put world's economic plans in
reverse gear...
A year that seldom brought any news of
cheer...
A year full of doom and gloom, tears, and
fear...
Fear of fellow humans' touch...
Fear of not having enough...
Fear of losing the ones we love...
Fear of upsetting 'the one' up above...
Millions lost lives to a 'human error'...
World was scared, everyone lived in terror...
2020 was also a year of little learnings
& big reminders...
It reminded us to be thankful, generous &
kinder...
It gave us the time to slow down and take a
pause...
It reminded us to celebrate life for no
reason, no cause...
It gave us time to look within, think &
introspect...
It reminded us to be humble & treat all
with equal respect...
It showed us, there is not much in our
control...
It reminded us to synchronize our mind, body
& soul...
In short, 2020 taught lessons, some bitter
some sweet...
It was a year when humans lost but was
humanity's great feat...
As we get ready to bid adieu to 2020 and walk
into a new year...
I sincerely thank god for keeping safe, all
those we hold dear...
I hope the new year brings peace, prosperity
& good health for everyone...
With a grateful & hopeful heart, I wish
you a very happy Twenty-Twenty One.
Wednesday, July 8, 2020
क्वॉरंटीन जन्मदिन :)
“तो अब जब कर लिया उम्र का एक और पड़ाव पार 🏃🏻♀️...
कैसा लगता है आपको जन्मदिन पर इस बार ?...” 😛
कुछ अपने मुस्कुराते 👅 हुए पूछ ही लेते थे हर साल...
घबराहट 🥴 पैदा करता था किसी के उम्र पूछ लेने का ख़्याल...
क्यूँकि ढलती उम्र की पोल खोल ही देते थे फूले बाल...🤦🏻♀️
तो “बहुत बढ़िया” कहकर मैं टाल देती थी आगे के सवाल...😳
पर होनी को कहाँ, कोई, कभी, किसी भी तरह टाल सका है...
आख़िर, स्वाँस और उम्र का रिश्ता तो स्वयं ईश्वर 🙏 का रचा है...
बढ़ती ⬆️ उम्र तो निशानी है जीवन की, कि स्वाँस अभी तक रुकी 🚦नहीं है...
कि ख़्वाब 💭 कुछ अधूरे अब भी हैं, की आस अभी तक थकी 🚴🏻♀️नहीं है...
कि ये बाल धूप में नहीं किए सफ़ेद, दशक बीते तब आया इनमें ये रंग सुनहरा 👩🏻🦳 है...
कि ये रेखाएँ यूँ ही नहीं खिचीं चेहरे पर 👵🏻, हर रेखा के पीछे छिपा राज एक गहरा है...
तो सोचा इस बरस इस सवाल को गोल नहीं घूमाऊँगी 🙅🏻♀️...
ये बरस ही आया है कुछ ऐसा, सब बोलकर 🗣 बतलाऊँगी...
इस बार कुछ डरा-डरा🙍🏻♀️ सा है मन मेरा...
कैसे कहूँ, कुछ भरा-भरा 😥 सा है मन मेरा...
सोचा नहीं था 🤯 जो कभी, वो दिन एक महामारी 🦠 ने दिखलाया है...
पहले से सिमटती सबकी दुनिया को, अब केवल घर 🏠तक ही सिमटाया है...
करोना पॉज़िटिव ➕और नेगेटिव➖, इंसानो में अब बस ये दो खंड हो गये...
जीवन और मृत्यु दोनों ही, इस परिस्थिति 😷 में तो दण्ड हो गए...
ना सबके साथ मिलकर ख़ुशी मना 💃🏻सकते हैं...
ना किसी के दुःख में शामिल होने जा 🚶🏻♀️सकते हैं...
ज़रा बताइये ये डर-डर कर जीना भी कोई जीना है लल्लू?
करोना काल में ज़िंदगी हो गयी बाबाजी का ठुल्लू 👎
ऐसे में क्या तो जन्मदिन 🤷🏻♀️ और कैसा उसका जश्न...
स्वाँस रही तो अगले बरस फिर आएगा ये बार, ये लग्न 🥳...
फिर नव ऊर्जा से सोचूँगी, उम्र को अपनी कैसे छिपाऊँ 🤓...
...
Tuesday, May 19, 2020
गर बच गए तो आनेवाली पुष्तों को शायद ये सिखलाएँगे...
Friday, May 15, 2020
आरज़ू फ़ुर्सत की
मुद्दत से आरज़ू थी फ़ुर्सत की, फ़ुर्सत जो आयी तो शर्तों पर...
पहले कहीं नहीं थी, फिर हर घर में, पर धूल जमीं रही परतों पर...
इम्तिहान दिए थे कयी पहले, पर 'लाक्डाउन के उपचार' का ज़िक्र कभी नहीं था पर्चों में...
वक़्त मिला बेइंतहा, इतने का करते क्या, तो जी-भर गुज़ारा बेतुके चर्चों में...
फ़ुर्सत में अमीर-ग़रीब, अक़्लमंद-मंदबुद्धि सब समान हैं, रहा फ़र्क़ नहीं कुछ दर्जों में...
और यूँ तो दुनिया पूरी बंद पड़ी है, पर कमी ज़रा ना आयी घर ख़र्चों में...
क्यूँकि दो जून की रोटी तब भी ज़रूरत थी, अब भी शामिल हैं इंसानी फ़र्ज़ों में...
पहले हम-तुम जैसे शायद कुछ थे, फ़ुर्सत ने इंसान नहीं कयी देश डुबाये क़र्ज़ों में...
इससे तो फ़ुर्सत ना आती, क़ुदरत ना क़हर यूँ बरसाती...
वक़्त ना होता पास मेरे पर बिटिया मेरी स्कूल को जाती...
संग अपने दोस्तों के खेलती, खिलती, सीखती, हँसती-मुस्कुराती..
"ये मत करो, वो मत करो", दिनभर बात-बात पर डाँट ना खाती...
फ़ुर्सत की बस आरज़ू ही अच्छी थी, असल ज़िंदगी में ये रास ना आयी...
झंडे तो कहीं गाड़े नहीं, बस खाया-पिया और तोंद कमाई...


