Friday, April 28, 2017

कहानी ( भाग-1)

बहुत खुश थी वो उस दिन... दो साल हो गए थे उसे अपनों से मिले और इस बार तो अपने नन्हे-मुन्हे से भी मिलवाना था सबको... कई बरसों की प्राथनाओं से आया था नन्हा उनकी जिंदगी में.. लाजमी है आंखों का तारा था....

मुन्ने के लिए क्या ले जाना है क्या नहीं इसी उधेड़ बुन में थी कई दिनों से.. पाँव जैसे ज़मीन पर पड़ ही नहीं रहे थे उसके... बहुत ध्यान और लगन से उसने इस यात्रा की तैयारी की.. अटेचियों में भरने के लिए सब समान अब तैयार था...बस समान भर कर घर से निकलने की देर थी...दिल में अनंत उत्साह और सबसे मिलने पर ना जाने क्या-क्या होने की उम्मीदें बाँध ली थीं उसने मन ही मन...  

फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसके होने का उसने अनुमान भी ना किया था... कुछ ऐसा जिसके होने ने उसे उसके ही घर में ख़ुद के अस्तित्व के बारे में सोचने पर मज़बूर कर दिया... "क्या मेरा कोई वजूद नहीं ? क्या मेरी राय, मेरी बात का कोई महत्व नहीं? क्या इस घर की चार दीवारों में अपनी दुनिया बना लेने से मेरी दुनिया इसमें ही सिमट कर रह जाएगी?" ऐसे कितने ही सवाल उसके दिमाग़ से निकल कर दिल को छलनी किए दे रहे थे... 

अगले दो दिन वो बिलकुल चुप रही... इसी उम्मीद में की कोई उसके बिना कहे उसके सवालों के जवाब उसके लिए ले आएगा और उसे बिखरने से बचा लेगा... पर कोई जवाब ना आया.. सवाल दिन दुगनी रात चौगुनी तरक़्क़ी करते रहे... दिल भर सा गया... आँखें आँसुओं को अपने अंदर समेटे रहीं.. आस-पास सब वैसा ही चल रहा था बस वो वैसी नहीं थी.. चेहरे और चित्त पर एक ही भाव था... निराशा का...

मानो अटेचियों में समान के साथ अपनी मुस्कान भी बंद कर दी हो उसने.. 

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