Monday, February 5, 2018

What’s there in a name?

Shakespeare rightly said, what is there in a name?
A rose by any other name would smell the same.
One mother gave birth to a boy, called him ‘Ram’ (Singh),
She probably hoped that like the god, her son will become a righteous man,
Instead he raped a girl with five other friends,
Only to commit suicide in prison at the end...
While another mother named and likely treated her son more human...
She called him Kapil (Kundu), for India’s enemies who was a demon...
All of 22, he was full of love for his motherland, zeal & valor, 
His planned surprise visit to his mother for his 23rd birthday happened wrapped in tricolor...
Both mothers lost their sons; both must have felt the same pain...
While one mother would live with her head held high in  pride, other’s would be forever bent in shame....

#KapilKundu #AMothersPride #MakeYourSonsHuman

P.S. : Time changes perceptions and thoughts; probably that’s why after years of having asked , “What isn’t there in a name?”, I finally agree with Shakespeare.

Saturday, February 3, 2018

मोदीजी छप्पन इंच का सीना कुछ यूँ दिखाइए...

मोदीजी छप्पन इंच का सीना कुछ यूँ दिखाइए...
बलात्कारी जितने सत्ता में बैठे हैं, उन्हें जेल पहुँचाइए...
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ से कुछ नहीं होगा सरजी...
बलात्कार से बेटियों की तार-तार होती हिम्मत को पहले बचाइए...
बेटियाँ और माएँ दोनो ही डरी सहमी जीं रहीं हैं...
कैसे बचें इन पुरुष रूपी चीलों और गिद्दों से ये बतलाइए...
टूट रहीं हैं घुट रहीं हैं, इन्हें जीते जी मरने से बचाइए...
इनके आत्म विश्वास की नैया को कुछ भी कर पार लगाइए...
मोदीजी छप्पन इंच का सीना कुछ यूँ दिखाइए...
बलात्कारी जितने सत्ता में बैठे हैं, उन्हें जेल पहुँचाइए...

#InfantRape #PMMODIJI #INDIAPMO #PainOfAMother #EnoughIsEnough #whenwillthisend

Tuesday, January 30, 2018

हमारी प्यारी अम्माँ

कल लम्बी उम्र की दुआ देते थकते ना थे जो,
आज हमसे अपने लिए ये दुआ चाहते हैं.. 
कहते हैं कर देना एक पार्थना ईश्वर से मेरे लिए
अपने असहाय शरीर से आत्मा की मुक्ति माँगते हैं...
दिमाग़ कहता है, दे दूँ विदा
जाने दूँ इनको जहाँ जाना चाहते हैं...
पर मतलबी ये दिल, है जिद्द पर अड़ा,
कैसे छोड़ूँ उन्हें, हाथ सर पर जिनका सदा चाहते हैं...
कल घाव पर मरहम लगाते थे जो
आज उन हाथों पर दिखते अनगिनत घाव हैं...
आँसुओ से भरें हैं नैन मेरे तो क्या,
सर पर अब भी मेरे, ममता की छांव है...
ना शक्ति है तन में, ना उत्साह है मन में,
पर एक डोर अभी भी कहीं लटकी हुई है...
हर आहट पर सहम कर खुलती हैं आँखें,
की साँसे अभी भी कहीं अटकी हुई हैं...
दूँ कैसे विदा मैं तुझे मेरी माँ,
दर्द मेरे सारे तू पी गयी... 
तू तिल-तिल अंदर से मरती रही,
मैं समझी की तू ज़िंदगी जी गयी...
मैं दुनिया में अपनी मगन हो गयी,
तू चिंता में मेरी खोयी रही..
मैं सपनो के पीछे भागती गयी,
पर तू चैन से कभी सोयी नहीं...
माँ...स्वार्थी हूँ मैं, अपना ही सोचती हूँ,
आज भी अपने लिए ये दुआ माँगती हूँ...
जा...जाना जहाँ है तुझे,
पर बनेगी माँ हर जन्म में मेरी, तुझसे ये मैं वायदा चाहती हूँ...
जा बाबू से कहना, उनको भूली नहीं मैं..
जब होंगी अकेली, ढूँढूँगी तुम दोनो को, यहीं मैं...
रहना आस-पास मेरे,इतना तुम दोनो से चाहती हूँ...
दे त्याग इस बेबस जीवन को अब,मेरी माँ,
तेरे लिए बस अब ख़ुशी चाहती हूँ...
तेरे लिए बस अब ख़ुशी चाहती हूँ...



हमारी प्यारी अम्माँ को समर्पित. 🙏

Saturday, January 27, 2018

घर की रौनक़

नन्ही उसकी उँगलियाँ जो भी खिलौना उठातीं हैं...
बढ़े चाव-भाव और ध्यान से उसे सीने से लगातीं हैं...
कोमल उसके होंठ उसे बेबी-बेबी कह बुलाते है...
ख़ुद को मम्मा बुलवा, स्वयं को बड़ा जान इठलाते हैं...
छोटे-छोटे उसके पाँव घर भर में धम्म-धम्म करते जाते हैं....
खेल-खिलौने, कापी-पेंसिल सब पर चढ़ आगे बड़ जाते हैं...
नया खिलौना, खेल नया, केवल तब तक मन बहलाता है...
कुछ और नया जब तक सामने नहीं जाता है...
चावल-दाल, रोटी-सब्ज़ी, इनकी जिभवा को कहाँ भाते हैं...
ये तो बस चौकलेट, कैंडी, मेकरोनि, मैगी ही खाना चाहते हैं...
सूने अपने घर में, इतनी रौनक़ जो ले आयी है...
गुड़िया-सी वो परी शायद पूर्व जन्म की पनुली माई है...





बच्ची की पर दादी को प्यार से गाँव वाले पनुली माई बुलाते थे...

Saturday, January 13, 2018

नए युग के न्यूटन

सोशियल मीडिया ने दुनिया में कुछ यूँ हड़कम्प मचाया है...
ऐरे-गेरे हर नत्थु खेरे को बेमतलब ही सही, बस कुछ कहने को ऊकसाया है..
इधर-उधर से, किधर-किधर से नत्थु जी बातें धूँडके लाते हैं...
तेढ़ी-मेढ़ी, आढ़ी-तीरछी अपनी तिगडम भी भिड़ाते हैं..
फिर तर्क-वितर्क से कोसों दूर उस तिगडम में शब्द बिठाते हैं...
तब कहीं कुछ लाइक और चंद कमंट पा ख़ुद को न्यूटन जान इतराते हैं...