Thursday, February 16, 2023

चौदह बरस


रेत जैसे हाथ से फिसल रहा है,
क्षण-क्षण कर वक्त पहर में बदल रहा है|
जाने कब पहर बने दिवस,
दिवस भी बीते बनके बरस|
देखते-देखते बरस बने दशक,
दशक बीते भी हुए बरस चार,
चौदह बरस जाने कब गुज़रे?
करते प्यार-टकरार,
यूँ ही बीतें बरसों बरस,
हे प्रभु! इतनी विनती करना स्वीकार|
वनवास की अवधी पुरी हुई,
किंतु श्री राम की स्वदेश वापसी अभी शेष है,
ये दूरी भी जल्द मिटे,
इसी कोशिश में रात दिन श्री शैलेश है |
इन बर्षों में आप सभी के साथ व शुभ कामनाओं
का भी कोटि-कोटि आभार,
स्वस्थ रहें, दीर्घायु हों आप,इच्छाएँ हों सब पूर्ण..
साथ बना रहे आप सभी का भी, हो सौभाग्य अक्षुण्ण |

 

Friday, December 31, 2021

नव वर्ष 2022 की हार्दिक शुभकामनाएँ

 




बीते दो वर्षकहीं इंसान को इंसानियत सिखा गये...

तो कहीं उसकी लालचअहमलोभ का परम दिखा गये...

कहीं बच्चों के सर से माँ-पिता का साया गया...

तो कहीं बुजुर्गों का अपना-सा को पराया गया ...

कहीं सब तक खबर पहुँचाने वालेखुद खबर बन गए...

तो कहीं ख़ुशियों से महकते घरउन ख़ुशक़िस्मतो की कब्र बन गए...

जाने कितने ही अपने पीछे छूट गए...

जाने कितनो के सपने पूरे टूट गए...

2022 तुम कुछ यूँ आनादुःख सभी के बिसराना...

ख़ुशियाँ नई बेशक ना लानापर र्द पुराने ले जाना...

डरेसहमेहताशनिराशबेबसहैं इंसान अभी...

एक नए विश्वासनव चेतना की आस लगायें हैं सभी...

वो आस-विश्वासवो उम्मीद-उत्सा भी चाहे मत देना...

पर अब भी जो बाक़ी है ज़रा-सा साहसकहीं किसी में वो ना लेना...

 नए सालग़र कुछ कर सकते हो तो बस इतना करना...

खुश हैं जो अब भी हर हाल मेंमुस्कान उन चेहरों पर बनाये रखना

जाते हुए साल को सलामआने वाले साल को सलाम....

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथछोटों को प्यार बढ़ो को प्रणाम 




Sunday, November 14, 2021

ख़ुद को नेक दूसरे को फ़ेक बताते हैं :)



कहने वाले कह गये 

जो गरजते हैं

वो बरसते नहीं

दिखावों पर ना जाइए

अपनी अक्ल लगाइए

दिखावे जो करते हैं

वो अक्सर भूल जाते हैं

वादे वो करते हैं

तो अक्सर तोड़ जाते हैं

कहते कुछ है

करते कुछ हैं

ख़ुद को नेक 

दूसरे को फ़ेक बताते हैं

ये वही हैं जो 

एक बार काम कर दें

तो ज़िंदगी भर सुनाते हैं

इनकी बातों पर ना जाइए

ये सच बोलते तो है

पर सुनने में

सदा कतराते हैं 


 

Wednesday, July 7, 2021

जो

खुद की ज़रूरत पड़ने पर ही 'जो 'नज़र आते हैं,
बार-बार, गिन-गिनकर अपने एहसान 'जो' याद दिलाते हैं...
अपने, केवल अपने, बस अपने ही बखान 'जो' किए जाते हैं...
स्वयं को दुनिया जहां में 'जो' सबसे बेहतर बतलाते हैं...
और अपनी ख़्वाहिशों का बोझ दूसरे पर थोपते 'जो' ज़रा ना हिचकिचाते हैं...
दूसरे की उपलब्धियों पर बेझिझक 'जो' अपना हक़ जताते हैं..
पर दुसरे की ज़रूरत के समय अपनी ज़िम्मेदारी से 'जो' आँख चुराते हैं...
समाज के आगे 'जो' अपनों की बेज़्ज़ती करते ज़रा ना कतराते हैं..
और अपने कष्टों की गाथा ही 'जो' तोते की तरह रटते जाते हैं...
आपकी राय में , ये 'जो' क्या कहलाते हैं?