Thursday, May 14, 2020

एक वो और एक हम

एक वो हैं जो कहते हैं, सब रिश्ते छोड़ दिए हमारे कारण, 
एक हम हैं, कि याद नहीं कोई रिश्ता और भी था हमारा, 
एक वो हैं  जिनकी नज़रें, हवा में हवाई जहाज़ पर गढ़ी हैं,
एक हम हैं, जो ज़मीन पर आलू मूली में उलझे पड़े हैं,  
एक वो हैं जो आसमान, मुठ्ठी में करने की ख्वाइश रखते हैं,
एक हम हैं, जिसने आखरी ख्वाइश क्या की थी वो भी याद नहीं, 
एक वो हैं जो दुनिया, को खुश रखने का जिगर रखते हैं, 
एक हम हैं, जो उन्हें ही दुनिया बनाये बैठे हैं |  

Sunday, March 29, 2020

कोरोना का क़हर

दुनिया पूरी बैठायी घर में, एक वाइरस ने ऐसा चक्र दिया घुमाए...
विश्व भर में घूम-घूमके, पूरे विश्व को एक-सा दिया बनाए....
पलक झपकते बदली दुनिया, दिमाग़ की बत्ती अब भी टिमटिमाए...
ये क्या हुआ, क्यूँ हुआ, सोचूँ बार-बार, पर कुछ भी समझ ना आए...
कोई तो बताए, एक छोटे-से वाइरस में, इतनी शक्ति कहाँ से आए...
विश्व के बुद्धिजीवों और वैज्ञानिकों को अपने आगे दिया झुकाए...
सशक्त-कमज़ोर, सभी डरे हैं, सबको घर में दिया छुपाए...
अमीर को प्राणों का डर है, गरीब को पेट का, और ये डर दिन-दिन बढ़ता ही जाए...
डरी- सहमी, इस दुनिया को अब कौन ये समझाए...
जब बोए पेड़ बबूल के, तो आम कहाँ से खाये??
पेड़ काट इमारतें बनायी, नदियाँ काट बांध दिए बनाए...
थल-जल बाँट मन ना भरा, तो मंदिर-मस्जिद खड़े कराए...
खुद को बढ़ा बनाने में, दुनिया इतनी ग़ुम थी हाय...
उससे भी ऊपर है जो, दिया था मन-मस्तिष्क से भुलाए....
अब दुनिया सारी रुक ही गयी है, मानो ऊपर वाले ने Pause बटन दिया दबाय,
झूठी ख़ुशियों में मशगूल दुनिया को, सत्य का दर्पण दिया दिखाए...
जहां भी देखो खबर वही है, बीमारों की गिनती बढ़ती-ही जाए...
दवा मिली ना दुआ लगी, न नज़र में आता अब तक कोई उपाय... 
बाहर निकलने के ख़्याल से, दिल की धड़कन बड़-सी जाए...
साबुन और सेनीटाईज़र से हाथ फट गए, पर इन्फ़ेक्शन का डर कम ना हो पाए...
किसी ने खोया अपना प्यारा, किसी ने रोज़ी-रोटी दी गँवाये...
पर सोसियल मीडिया की crazy दुनिया को, इसमें भी humor देता दिखाए...
अलाद्दीन का चिराग़ आज जो मेरे हाथ कहीं लग जाए...
पहली ख्वाहिश में दूर करूँ दुनिया से सभी दुःख, कष्ट और यातनाएँ...
दूजी में मांगु हर इंसान के लिए एक समान सुख सुविधाएँ...
तीजी में माँग लूँ सबकी लम्बी आयु, सब हंसते हंसते ईश्वर घर जाएँ...

Friday, March 27, 2020

Just for FB - 2020 (5)

मंदिर बंद, मस्ज़िद बंद, बंद है गुरुद्वारे और गिरजाघर,
मानो ईश्वर स्वयं रुष्ट हो गए , मानव के अभिमान पर,
नाम प्रभु का ले थे जो लड़ रहे, पल-पल अपनी मनमानी कर ,
भगवान ने कर दिये सब द्वार बंद, इंसान की ऐसी नादानी पर,
धन दौलत की अकड़ तेरी बन्दे, सब मिल गयी चुल्लू भर पानी में,
अंत नहीं, है अभी अल्पविराम ये, बिता कुछ समय आत्मग्लानि में,
ट्रेलर से ही तू डर गया, पिक्टर क्या ख़ाक देख पायेगा,
याद रख, खाली हाथ आया था, खाली हाथ ही जायेगा,
समय रहते संभल जा पौरुष, ये वक्त लौट के फिर न आएगा,
कण-कण में है वास ईश्वर का, मानेगा तब ही भव तर पायेगा | 

Monday, March 16, 2020

तोल मोल के बोल

'उनके' घर को 'अपना' घर, जब झुंझला कर पुरुष ने बोल दिया...
मानो बेदख़ल करने को जीवन से, दिल के पटों को पलक झपकते खोल दिया...
नारी के वर्षों के प्रेम को, उसने अपने क्षण भर के क्रोध से कम तोल दिया...
किसकी लगी नज़र उनके जीवन को, ये किसने उसमें यूँ विष घोल दिया...
मुस्कानें अब कम आती हैं चेहरों पर, अश्रुओं का भी कहाँ कुछ मोल रहा...
बातें बहुत कम होती हैं अब, जीवन में वार्तालाप का शून्य अब रोल हुआ...

Thursday, March 12, 2020

Just for FB - 2020 (4)

डरा, सिमटा-सा दिखता है आज मेरा शहर,
डरी-सी शामें हैं आजकल, और डरी-सी सहर,
सामान्य चलते जीवन को लगी जाने किसकी नज़र, 
कभी प्रदूषण, कभी दंगों और कोरोना ने मचाया है क़हर!

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